अखिल हरियाणा लखेरा महासभा
“हमारी कला हमारी पहचान, हमारी संस्कृति हमारी विरासत और हमारी एकता हमारी शक्ति है।”
लखेरा समाज भारत की प्राचीन एवं गौरवशाली हिंदू शिल्पकार परंपराओं में से एक है। लखेरा समाज की सबसे प्रमुख पहचान लाख की चूड़ियाँ, चूड़े, कंगन तथा लाख से बनी विभिन्न कलात्मक वस्तुओं के निर्माण और व्यापार से रही है।
“लखेरा” नाम को लाख के कार्य से जोड़ा जाता है। ऐतिहासिक स्रोतों में लखेरा नाम का संबंध संस्कृत के लक्ष/लाक्षा से तथा लाख के काम से बताया गया है। पुराने समय से ही लखेरा समाज के कारीगर अपने हाथों की कला से लाख को सुंदर चूड़ियों और आभूषणों का रूप देते आए हैं।
हरियाणा सहित उत्तर भारत में लखेरा समाज को पारंपरिक रूप से लाख की चूड़ियों के निर्माण और बिक्री से जुड़े हिंदू समुदाय के रूप में दर्ज किया गया है।
लाख की चूड़ी केवल एक आभूषण नहीं है। भारतीय संस्कृति में चूड़ी को सुहाग, मंगल, सौभाग्य और पारिवारिक खुशहाली का प्रतीक माना गया है।
लखेरा समाज ने इस परंपरा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने हाथों की मेहनत और कला से जीवित रखा।
पुराने समय में लखेरा समाज के कारीगर गाँव-गाँव, शहर-शहर और मेलों में जाकर लाख की चूड़ियाँ और अन्य सामान बेचते थे। चूड़ियाँ बनाना, उन्हें गर्म करके आकार देना, रंग देना, सजाना और ग्राहक की पसंद के अनुसार तैयार करना एक विशेष प्रकार का पारंपरिक कौशल रहा है।
आज भी लाख की चूड़ी निर्माण कला राजस्थान सहित भारत के कई हिस्सों में लखेरा समाज की महत्वपूर्ण पारंपरिक विरासत है। राजस्थान के हस्तशिल्प संबंधी अध्ययनों में भी लाख की चूड़ी कला को लखेरा समुदाय से जोड़ा गया है।
लखेरा समाज की उत्पत्ति को लेकर समाज में विभिन्न पौराणिक एवं लोक मान्यताएँ प्रचलित हैं।
समाज की एक प्रमुख मान्यता के अनुसार लखेरा समाज की परंपरा का संबंध भगवान शिव और माता पार्वती से है।
मान्यता है कि भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह के अवसर पर माता पार्वती ने सुहाग के प्रतीक के रूप में लाख की चूड़ियाँ धारण करने की इच्छा व्यक्त की। भगवान शिव ने अपने भक्त को लाख की चूड़ियाँ बनाने का आदेश दिया। भगवान के आदेश से लाख की चूड़ियाँ तैयार की गईं और माता पार्वती को पहनाई गईं।
इसी धार्मिक लोक-परंपरा को लखेरा समाज अपने पारंपरिक लाख-शिल्प की आध्यात्मिक शुरुआत से जोड़कर देखता है।
लखेरा समाज की उत्पत्ति को लेकर अन्य लोककथाओं में भी भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान कृष्ण तथा क्षत्रिय/राजपूत परंपरा से संबंधित कथाएँ मिलती हैं। ऐतिहासिक ग्रंथों में भी लखेरा समुदाय की उत्पत्ति के संबंध में अलग-अलग परंपराओं का उल्लेख मिलता है। इसलिए इन कथाओं को समाज की धार्मिक एवं लोक-मान्यताएँ मानकर सम्मानपूर्वक देखा जाना चाहिए।
🌺 चेन्ना माता — कुसला माता
📍 बजनेरी धाम, बूंदी, राजस्थान
लखेरा समाज की धार्मिक एवं सांस्कृतिक आस्था में माता चेन्ना माता एवं कुसला माता का विशेष स्थान माना जाता है।
समाज की मान्यता के अनुसार हमारी कुलदेवी चेन्ना माता–कुसला माता का पवित्र धाम बजनेरी धाम, जिला बूंदी, राजस्थान में स्थित है।
यह स्थान लखेरा समाज के लिए केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि हमारी आस्था, कुल परंपरा, पूर्वजों की स्मृति और सामाजिक एकता का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।
देश के अलग-अलग राज्यों में बसे लखेरा समाज के परिवार अपनी कुलदेवी के प्रति श्रद्धा रखते हैं। विवाह, पारिवारिक शुभ अवसरों तथा अन्य धार्मिक अवसरों पर कुलदेवी का स्मरण करना और उनका आशीर्वाद प्राप्त करना समाज की धार्मिक परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
🙏 जय माता चेन्ना माता
🙏 जय माता कुसला माता
🙏 जय बजनेरी धाम
भारतीय समाज में कुलदेवी की परंपरा परिवार और समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम रही है।
लखेरा समाज में भी कुलदेवी की आस्था पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक परंपराओं का हिस्सा है। कुलदेवी के प्रति श्रद्धा हमें अपने पूर्वजों, अपनी संस्कृति और अपनी सामाजिक पहचान से जोड़ती है।
चेन्ना माता–कुसला माता के प्रति श्रद्धा लखेरा समाज की धार्मिक एकता का प्रतीक है।
हमारा विश्वास है कि माता का आशीर्वाद समाज के प्रत्येक परिवार पर बना रहे और समाज की नई पीढ़ी अपनी संस्कृति एवं परंपराओं को आगे बढ़ाती रहे।
लाख एक प्राकृतिक रेजिन है, जिसका उपयोग भारत में लंबे समय से विभिन्न कलात्मक वस्तुओं और आभूषणों के निर्माण में होता आया है।
लखेरा समाज ने लाख को अपनी विशेष कारीगरी से चूड़ियों, चूड़ों, कंगनों तथा सजावटी वस्तुओं का रूप दिया।
परंपरागत रूप से कारीगर लाख को गर्म करके नरम करते, उसे आवश्यक आकार देते और फिर विभिन्न रंगों तथा सजावटी सामग्री से सुंदर बनाते थे।
इस कला में केवल हाथ का हुनर ही नहीं बल्कि वर्षों का अनुभव, धैर्य और सूक्ष्म कारीगरी की आवश्यकता होती है।
ऐतिहासिक विवरणों में लखेरा समाज के पारंपरिक व्यवसाय के रूप में लाख की चूड़ियाँ और अन्य लाख की वस्तुएँ बनाने एवं बेचने का उल्लेख मिलता है।
भारतीय नारी के श्रृंगार में चूड़ियों का विशेष स्थान रहा है।
विवाह के अवसर पर चूड़ियाँ सुहाग और सौभाग्य का प्रतीक मानी जाती हैं। राजस्थान और उत्तर भारत की अनेक परंपराओं में लाख की चूड़ियों का धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व रहा है।
इस प्रकार लखेरा समाज की पारंपरिक कला केवल रोज़गार का साधन नहीं थी, बल्कि वह भारतीय संस्कृति के महत्वपूर्ण संस्कारों से जुड़ी हुई थी।
राजस्थान में लाख की चूड़ियों का उपयोग विवाह, तीज, गणगौर, करवा चौथ तथा अन्य शुभ अवसरों से जुड़ा हुआ है।
पुराने समय में लखेरा समाज के कारीगर अपनी चूड़ियाँ लेकर गाँव-गाँव जाते थे।
वे महिलाओं की पसंद और आवश्यकता के अनुसार चूड़ियाँ उपलब्ध करवाते थे। विवाह और अन्य शुभ अवसरों पर लखेरा समाज के कारीगरों की विशेष भूमिका होती थी।
इस प्रकार समाज ने अपनी कला के माध्यम से देश के ग्रामीण और शहरी जीवन में अपनी अलग पहचान बनाई।
लाख की चूड़ियों की यह परंपरा आज भी लखेरा समाज के अनेक परिवारों के लिए गर्व और पहचान का विषय है।
लखेरा समाज स्वयं को हिंदू समाज की एक गौरवशाली परंपरा से जोड़ता है।
समाज की अपनी धार्मिक आस्थाएँ, कुलदेवी की परंपरा, सामाजिक रीति-रिवाज और पारंपरिक व्यवसाय हैं।
ऐतिहासिक-सामाजिक अध्ययनों में लखेरा समुदाय को हिंदू समुदाय के रूप में दर्ज किया गया है और इसकी पहचान लाख की चूड़ी कला से जुड़ी हुई बताई गई है।
समय के साथ समाज के लोग केवल पारंपरिक चूड़ी व्यवसाय तक सीमित नहीं रहे। आज लखेरा समाज के युवा शिक्षा, सरकारी सेवा, निजी क्षेत्र, व्यापार, उद्योग, कृषि, राजनीति, सामाजिक सेवा और विभिन्न आधुनिक व्यवसायों में आगे बढ़ रहे हैं।
समय के साथ रोजगार, व्यापार और सामाजिक परिस्थितियों के कारण लखेरा समाज के परिवार देश के विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों में जाकर बसे।
हरियाणा, राजस्थान, पंजाब, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, दिल्ली तथा देश के अन्य हिस्सों में समाज के परिवार अपनी सामाजिक एवं सांस्कृतिक पहचान के साथ निवास करते हैं।
क्षेत्र के अनुसार समाज के स्थानीय रीति-रिवाजों और बोलियों में अंतर हो सकता है, लेकिन लाख की कला, हिंदू धार्मिक परंपराएँ, कुलदेवी के प्रति आस्था और सामाजिक एकता समाज की साझा विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
लखेरा समाज की शक्ति हमेशा उसके परिवार और सामाजिक एकता में रही है।
पूर्वजों ने कठिन परिस्थितियों में मेहनत करके अपने परिवारों का पालन-पोषण किया और अपनी कला को अगली पीढ़ी तक पहुँचाया।
समाज के बुजुर्गों का अनुभव, महिलाओं की मेहनत और युवाओं की ऊर्जा—इन तीनों ने लखेरा समाज को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
आज हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपनी नई पीढ़ी को अपने इतिहास, संस्कृति और परंपराओं से जोड़ें।
समय बदल रहा है और समाज के विकास के लिए शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण आधार है।
अखिल हरियाणा लखेरा महासभा का उद्देश्य समाज के बच्चों और युवाओं को शिक्षा के लिए प्रेरित करना, प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करना तथा समाज को आधुनिक समय की आवश्यकताओं के अनुरूप आगे बढ़ाना है।
आज लखेरा समाज के युवा डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, अधिकारी, व्यवसायी, उद्यमी, सामाजिक कार्यकर्ता और विभिन्न क्षेत्रों में अपनी पहचान बना रहे हैं।
आधुनिक बाजार में मशीन से बने उत्पादों और नए प्रकार की चूड़ियों के आने से पारंपरिक लाख शिल्प के सामने नई चुनौतियाँ पैदा हुई हैं।
हस्तशिल्प संबंधी अध्ययनों में भी यह चिंता सामने आई है कि नई पीढ़ी का एक हिस्सा पारंपरिक व्यवसाय से दूसरे रोजगारों की ओर जा रहा है। इसलिए इस कला को सुरक्षित रखना और आधुनिक बाजार से जोड़ना आवश्यक है।
हमारा प्रयास होना चाहिए कि—
अखिल हरियाणा लखेरा महासभा समाज की एकता, विकास और कल्याण के लिए कार्य करने का संकल्प रखती है।
महासभा का उद्देश्य है कि समाज के प्रत्येक परिवार को सामाजिक संगठन से जोड़ा जाए और शिक्षा, रोजगार, व्यवसाय, सामाजिक सेवा तथा सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में मिलकर कार्य किया जाए।
हमारा प्रयास रहेगा कि लखेरा समाज के गौरवशाली इतिहास, कुलदेवी की परंपरा और लाख की कला को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुँचाया जाए।
हम लखेरा हैं।
हमारी पहचान हमारी मेहनत से बनी है।
हमारे पूर्वजों ने लाख को अपने हाथों से आकार देकर चूड़ियों का रूप दिया और भारतीय संस्कृति में अपना योगदान दिया।
हमारी आस्था चेन्ना माता–कुसला माता, बजनेरी धाम, बूंदी राजस्थान से जुड़ी है।
हमारी संस्कृति हमें अपनी जड़ों से जोड़ती है।
हमारा इतिहास हमें मेहनत और संघर्ष की प्रेरणा देता है।
और हमारी नई पीढ़ी हमारे समाज का भविष्य है।
जय चेन्ना माता।
जय कुसला माता।
जय बजनेरी धाम।
जय लखेरा समाज।
जय हिंद।
🌹 “एकता में शक्ति — शिक्षा में प्रगति — संस्कृति में गौरव” 🌹
अखिल हरियाणा लखेरा महासभा

कुलदेवी — बजनेरी धाम, बूंदी, राजस्थान

कुलदेवी — बजनेरी धाम, बूंदी, राजस्थान